Teacher’s Day 2021: बदलते दौर के साथ कितना बदला गुरु-शिष्य का रिश्ता?

Teacher’s Day Special, Exclusive: भारत गुरु-शिष्य परंपरा की बेमिसाल धरती है. प्राचीन समय से अब तक यहां गुरु-शिष्यों ने कई मिसालें कायम की हैं. हालांकि, तब और अब के समाज और संस्कृति में काफी बदलाव आया है. निश्चित तौर पर इसका प्रभाव गुरु और शिष्यों के बीच संबंधों पर भी पड़ा है. गुरु और शिष्य के रिश्ते में कितना बदलाव आया है, इस विषय पर न्यूज़18 से बात करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर राजेंद्र गौतम ने कहा, ‘1974 में मैंने अध्यापन शुरू किया था. तब से आज तक गुरु और शिष्य के बीच संबंधों के भाव में काफी बदलाव आया है. हालांकि, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आज अच्छे गुरु और शिष्यों का अकाल है. आज भी कमोबेश वही स्थिति है जो पहले थी. हां, आज के समय में शिक्षा के लिए करियर प्रधान है. व्यक्तिगत जीवन में स्वार्थ सर्वोच्च हो गया है. आज अपने चिंतन से किसी विद्यार्थी का विकास नहीं हो रहा बल्कि करियर से उसका व्यक्तित्व निखरता है. आज के समय में माता-पिता की भी यही आशा होती है कि उनका बच्चा रोजगारपरक शिक्षा अर्जित करें.’

‘पहले पिटाई की गलत परंपरा थी’
प्रोफेसर राजेंद्र गौतम कहते हैं, ‘तब और अब में एक और बड़ा अंतर यह आया कि तब माता-पिता अपने बच्चों को गुरुजनों के सामने पूरी तरह सौंप देते थे. आज का माहौल इसके विपरीत है. बच्चों को थोड़ी डांट भी लग जाए तो माता-पिता खुद शिक्षकों के खिलाफ आक्रामक हो जाते हैं. हालांकि, पहले पिटाई की बहुत ही गलत परंपरा थी. इस प्रचलन में कई शिक्षक छात्रों के साथ क्रूरता से पेश आते थे पर यह भी नहीं होना चाहिए कि शिक्षक छात्रों को मनमानी करने की पूरी छूट दे दें. वास्तव में आज ऐसा ही है. आज कोई भी शिक्षक छात्रों की गलती को सिर्फ देख सकता है, उसे कुछ बोल नहीं सकता.’

शिक्षकों के प्रति अवज्ञा भाव बढ़ा है
प्रोफेसर गौतम बताते हैं कि आज शिक्षकों के प्रति अवज्ञा भाव बढ़ा है. इसका कारण दोनों तरफ से विचलन है. भौतिकतावादी समाज में सब्जेक्टिवनेस (व्यक्तिनिष्ठता) मुख्य ध्येय हो गया है. अवज्ञा भाव सिर्फ शिक्षकों के प्रति ही नहीं है बल्कि परिवार के अंदर भी है. उनका कहना है, ‘अपनों के बीच भी अवज्ञा बहुत निचले स्तर पर आ गई है. दूसरी ओर इसके लिए शिक्षक भी जिम्मेदार हैं. मुझे 42 साल के अपने शिक्षण कार्य में कभी अवज्ञा संबंधी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा.’

इंटरनेट ने शिक्षकों का महत्व कम किया
प्रोफेसर गौतम ने कहा कि कई बार अध्यापक को अप्रासंगिक मान लिया जाता है. छात्र के मन में एक अलग तरह का भाव पैदा हो जाता है. इंटरनेट ने भी इस काम को और बिगाड़ा है. छात्र इंटरनेट के माध्यम से जो पढ़ते हैं, वह शिक्षक की बात से मेल नहीं खाती तो वह समझते हैं कि शिक्षक को इसकी जानकारी नहीं. उन्होनें कहा, ‘इसका एक रोचक उदाहरण बता रहा हूं. एक बार पोलैंड की एक छात्रा मेरे विश्वविद्यालय में पढ़ने आई थी. उसे अपने सहपाठी का परिचय देना था. उसने कहा मेरा मित्र फलां है. उसकी लंबाई दो छंद है. हालांकि, इसमें उस छात्रा की गलती नहीं थी. दरअसल, उसने इंटरनेट से मीटर का हिंदी पर्याय खोजा था, जिसमें मीटर का एक पर्याय छंद भी था.’

शिक्षक दिवस जिस उद्येश्य से मनाया जाता है क्या उसकी पूर्ति हो पाती है?

प्रोफेसर गौतम कहते हैं कि शिक्षक दिवस एक रिमाइंडर होना चाहिए, जिसमें हम खुद को रिव्यू कर सके. सिर्फ ग्रीटिंग्स के लिए इसे नहीं मनाया जाना चाहिए. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जो आदर्श है, उससे हमें सीख लेने की जरूरत है. तभी इस दिवस को मनाने का फायदा है.

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